Kisan khad subsidy
सरकार ने यूरिया के दुरुपयोग को रोकने के लिए फार्मर आईडी आधारित नई प्रणाली शुरू की। प्रति हेक्टेयर 7 बोरी तक सीमित, उत्तर प्रदेश में 1 जून से लागू। 41,000 करोड़ सब्सिडी से किसानों को राहत।
सरकार ने यूरिया के दुरुपयोग को रोकने के लिए फार्मर आईडी आधारित नई प्रणाली शुरू की
भारत सरकार ने यूरिया खाद के वितरण में बड़ा बदलाव किया है। अब किसानों को उनकी जमीन के आकार के अनुसार ही यूरिया खाद मिलेगी। इसका मुख्य उद्देश्य खाद की कालाबाजारी और दुरुपयोग को रोकना है, ताकि सरकारी सब्सिडी का लाभ सीधे किसानों तक पहुंचे।
सरकार ने तय किया है कि एक हेक्टेयर जमीन पर अधिकतम 7 बोरी यूरिया दी जाएगी। खाद खरीदते समय किसानों को अपनी फार्मर आईडी दिखानी होगी। यह आईडी दुकान पर लगी PoS मशीन में दर्ज की जाएगी, जिससे तुरंत पता चल जाएगा कि किसान के पास कितनी जमीन है और वह कितनी खाद खरीद सकता है।
किसानों पर आर्थिक बोझ न बढ़े, इसके लिए सरकार ने ₹41,000 करोड़ की अतिरिक्त सब्सिडी भी मंजूर की है। उत्तर प्रदेश में यह नई व्यवस्था 1 जून 2026 से लागू होने जा रही है।
यह नया नियम क्यों जरूरी था?
भारत में यूरिया पर सरकार भारी सब्सिडी देती है। किसानों को 45 किलो की एक बोरी यूरिया लगभग ₹266 में मिलती है, जबकि इसकी असली लागत करीब ₹2000 से ₹2200 तक होती है। इसी कीमत के अंतर का फायदा उठाकर कुछ लोग यूरिया को अवैध रूप से प्लाईवुड, रेजिन और टेक्सटाइल उद्योगों में बेच देते थे।
इसके कारण कई बार किसानों को समय पर खाद नहीं मिल पाती थी और बाजार में कृत्रिम कमी पैदा हो जाती थी। नई व्यवस्था इसी समस्या को खत्म करने के लिए लाई गई है।
नई डिजिटल व्यवस्था कैसे काम करेगी?
नई प्रणाली पूरी तरह डिजिटल होगी। हर किसान की फार्मर आईडी में उसकी जमीन का रिकॉर्ड, आधार नंबर और बैंक खाते की जानकारी जुड़ी होगी। जब किसान खाद खरीदने जाएगा, तो दुकानदार PoS मशीन में उसकी आईडी दर्ज करेगा।
मशीन तुरंत यह जांच करेगी कि किसान पहले कितनी खाद ले चुका है और अब उसे कितनी मिल सकती है। इससे जरूरत से ज्यादा खाद खरीदना संभव नहीं होगा। हर बोरी का पूरा रिकॉर्ड सिस्टम में दर्ज रहेगा, जिससे सरकार आसानी से निगरानी कर सकेगी।
सरकार और विशेषज्ञों की राय
केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि इस नई व्यवस्था से यूरिया का गलत इस्तेमाल रुकेगा और सब्सिडी सही किसानों तक पहुंचेगी। उर्वरक सहकारी संस्था इफको (IFFCO) ने भी इस फैसले का स्वागत किया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इससे खाद वितरण प्रणाली में पारदर्शिता आएगी और किसानों को लंबी कतारों से राहत मिलेगी। कुछ किसान संगठनों ने प्रति हेक्टेयर सीमा को लेकर चिंता जताई है, लेकिन सरकार का कहना है कि जरूरत पड़ने पर राज्यों को सीमा में बदलाव की अनुमति दी जा सकती है।
किसानों को क्या फायदा होगा?
नई व्यवस्था से किसानों को कई फायदे मिल सकते हैं। सबसे बड़ा फायदा यह है कि खाद की कालाबाजारी पर रोक लगेगी और जरूरत के समय किसानों को आसानी से यूरिया मिल सकेगा।
इसके अलावा डिजिटल रिकॉर्ड होने से वितरण प्रक्रिया पारदर्शी होगी और सरकारी सब्सिडी का सही उपयोग सुनिश्चित किया जा सकेगा। संतुलित मात्रा में खाद इस्तेमाल होने से मिट्टी की गुणवत्ता भी बेहतर रहेगी, जिससे फसल उत्पादन पर सकारात्मक असर पड़ेगा।
आगे की योजना
सरकार का लक्ष्य देशभर में लगभग 13 करोड़ फार्मर आईडी बनाना है। आने वाले समय में खाद वितरण प्रणाली को और आधुनिक बनाने के लिए ई-टोकन, जीपीएस ट्रैकिंग और जियो-टैगिंग जैसी तकनीकों को भी जोड़ा जा सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह व्यवस्था सही तरीके से लागू हुई, तो इससे न केवल खाद की उपलब्धता सुधरेगी बल्कि कृषि क्षेत्र में डिजिटल सुधार की दिशा में भी बड़ा कदम साबित होगा। कुल मिलाकर, जमीन के आधार पर यूरिया वितरण की यह नई नीति किसानों के लिए अधिक पारदर्शी और व्यवस्थित व्यवस्था बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल मानी जा रही है।
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