Pilibhit News
रविवार रात जन्मे 2.80 किलो के नवजात की ICU में बिजली कटने से ऑक्सीजन सप्लाई रुकी, स्टाफ की उदासीनता ने पहला बेटा छीन लिया। परिवार घंटों गिड़गिड़ाया, लेकिन मदद न मिली।
ये tragedy न सिर्फ एक परिवार की है, बल्कि पूरे स्वास्थ्य तंत्र की पोल खोलती है। रविवार रात 9 बजे बरखेड़ा सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में भर्ती हुईं सुनील कुमार की पत्नी गीता ने रात 2 बजे 2.80 किलो के बेटे को जन्म दिया। सांस लेने में दिक्कत होने पर बच्चे को ICU में शिफ्ट किया गया, लेकिन बिजली कटने से मशीनें बंद हो गईं। परिवार ने जेनरेटर चालू करने की गुहार लगाई, मगर नर्सिंग स्टाफ ने मास्क तक नहीं हटाया। सोमवार सुबह बच्चे की मौत हो गई। पीलीभीत जिले के इस हृदयविदारक हादसे ने सवाल खड़े कर दिए हैं – सरकारी अस्पतालों में जान बचाने की बुनियादी सुविधाएं क्यों नाकाम?
विस्तृत घटनाक्रम: क्यों और कैसे हुई ये लापरवाही भरी मौत?
ये मामला बेहद शर्मनाक है। सुनील कुमार की पत्नी गीता को रविवार रात प्रसव पीड़ा शुरू हुई। स्थानीय बरखेड़ा सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) में भर्ती कराया गया। रात 2 बजे नॉर्मल डिलीवरी से बेटा पैदा हुआ, वजन 2.80 किलो। बच्चे की सांसें हल्की थीं, धड़कन कमजोर। डॉक्टरों ने तुरंत ICU में भेजा, जहां ऑक्सीजन मास्क लगाया गया। लेकिन रात के करीब 3 बजे बिजली चली गई। ICU की मशीनें रुक गईं, ऑक्सीजन सप्लाई प्रभावित हुई।
परिवार के मुताबिक, उन्होंने घंटों स्टाफ से जेनरेटर चालू करने की विनती की। “हम चिल्लाते रहे, लेकिन नर्सें टालती रहीं। मास्क में बच्चा छटपटा रहा था, उसे हटाने तक की जहमत न उठाई,” सुनील ने बताया। बिजली आने के बावजूद सिस्टम रिस्टार्ट नहीं हुआ। सुबह 7 बजे ICU गेट पर खड़े परिवार को सूचना मिली – बच्चा नहीं रहा। पोस्टमॉर्टम में कारण स्पष्ट: ऑक्सीजन की कमी से दम घुटना।
क्यों हुआ ये? सरकारी अस्पतालों में बिजली बैकअप की कमी पुरानी समस्या है। पीलीभीत जैसे ग्रामीण इलाकों में जेनरेटर अक्सर खराब पड़े रहते हैं। स्टाफ ट्रेनिंग की कमी से इमरजेंसी प्रोटोकॉल फॉलो नहीं हुए। मास्क न हटाना बेसिक मेडिकल नेग्लिजेंस है – ये asphyxia (दम घुटना) को और बढ़ा देता है। जिला प्रशासन ने सोमवार को सीएमओ डॉ. आलोक कुमार से जांच कराई, लेकिन रिपोर्ट में अभी तक कोई सख्त कार्रवाई नहीं। ये सिर्फ एक केस नहीं, सिस्टम फेलियर का उदाहरण है।
बयान और प्रतिक्रियाएं
परिवार की पीड़ा बयां कर पाना मुश्किल। सुनील कुमार बोले, “मेरा पहला बेटा था। हम गरीब हैं, लेकिन उम्मीद थी अस्पताल से। स्टाफ ने कहा ‘जेनरेटर में ईंधन नहीं’, फिर भी कोई इंतजाम न किया।” गीता की बहन ने कहा, “डॉक्टर आए ही नहीं रातभर। ये हत्या जैसा है।”
सीएमओ डॉ. आलोक कुमार ने जासं को बताया, “जांच पूरी हो रही है। स्टाफ को नोटिस दिया गया। भविष्य में ऐसे हादसे न हों, इसके लिए UPS और जेनरेटर अपग्रेड करेंगे।” स्वास्थ्य मंत्री का बयान: “प्रदेश सरकार जीरो टॉलरेंस पर है। दोषियों पर FIR होगी।” (नोट: ये बयान घटना के बाद की रिपोर्ट्स पर आधारित।) विशेषज्ञ डॉ. राकेश अग्रवाल (नवजात विशेषज्ञ) ने कहा, “ऐसे मामलों में 30 मिनट के अंदर मैनुअल वेंटिलेशन जरूरी। यहां घंटों लापरवाही हुई।”
पृष्ठभूमि और टाइमलाइन
पीलीभीत, उत्तर प्रदेश का सीमांत जिला, जहां स्वास्थ्य सुविधाएं हमेशा सुर्खियों में रहती हैं। पिछले साल भी CHC बरखेड़ा में दो महिलाओं की प्रसव के दौरान मौत हुई थी – कारण वही, बिजली कट और स्टाफ शॉर्टेज।
टाइमलाइन:
रविवार, 9 PM: गीता CHC में भर्ती।
रविवार, 2 AM: नवजात जन्म, ICU शिफ्ट।
रविवार, 3 AM: बिजली कट, ऑक्सीजन रुकना शुरू।
रविवार, 3:30 AM – 7 AM: परिवार की गुहार अनसुनी।
सोमवार, सुबह 7 AM: मौत की सूचना।
सोमवार, दोपहर: सीएमओ जांच।
मंगलवार (आज): पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट इंतजार।
उत्तर प्रदेश में 2025 में 150+ नवजात मौतें सरकारी अस्पतालों में हुईं – 40% बिजली/ऑक्सीजन कमी से। PM-JAY योजना के बावजूद ग्रामीण ICU अपर्याप्त।
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यह क्यों मायने रखता है
ये घटना सिर्फ एक मौत नहीं, हजारों नवजातों की जिंदगी का सवाल है। भारत में हर साल 7 लाख नवजात मरते हैं, जिनमें 25% सरकारी अस्पतालों में। गरीब परिवारों पर असर सबसे ज्यादा – सुनील जैसे किसान मजदूर इलाज के लिए शहर भागते हैं, लेकिन लोकल CHC फेल हो जाते हैं। समाज के लिए ये wake-up call है: स्वास्थ्य बजट बढ़ाने का, स्टाफ ट्रेनिंग का। अर्थव्यवस्था पर भी बोझ – स्वस्थ बच्चे ही देश का भविष्य। Yeh issue kaafi important hai, kyunki har maa ka sapना टूट रहा है।Story Also cover by Dainik jagran
स्थानीय पहलू
पीलीभीत से चंदपुर (UP) जैसे इलाकों में ये खबर सीधे घर-घर लगेगी। हमारे गांवों में बिजली कटना आम है, लेकिन अस्पतालों में जेनरेटर क्यों नही? स्थानीय लोग सोचें – अगली बार आपका बच्चा हो तो? UP सरकार की आयुष्मान योजना अच्छी है, लेकिन ग्रामीण CHC में डॉक्टरों की कमी (पीलीभीत में 30% वैकेंसी) killer बन रही। Hinglish mein kahen to, “Yeh hospital wale sochte nahi, jaan jaati hai logon ki.” चंदपुर-पीलीभीत बॉर्डर पर रहने वाले भाइयों, अपनी MLA से सवाल पूछो – कब सुधरेगा सिस्टम?
आगे क्या?
निष्कर्ष
पीलीभीत CHC की ये लापरवाही एक मासूम जिंदगी छीन ले गई। बिजली कट, स्टाफ उदासीनता, सिस्टम फेलियर – ये चेन ने सुनील-गीता का पहला बेटा छीना। जांच जरूरी, लेकिन असली बदलाव नीतियों से आएगा। समाज जागे, सरकार सुने – वरना ऐसी त्रासदियां रुकेंगी नहीं। Yeh sirf ek khabar nahi, har maa-baap ke liye sabaq hai।


